यदि मैं पुलिस अधिकारी होता

प्रस्तावना : वह क्या बनना चाहता है ? यह प्रश्न शैशवकाल से ही हर व्यक्ति के मन में उभर आता  है। मेरे मन रूपी आकाश में भी ऐसे ही प्रश्नों ने खूब चक्कर काटे हैं। मैंने तभी से पुलिस अधिकारी बनने का निश्चय कर लिया था। उसका रौबदार चेहरा और शानदार वर्दी हमेशा आकर्षित करती रहती थी; पर इंसान की सभी इच्छाएँ तो कभी पूर्ण नहीं हो पाती है। उनकी पूर्ति में कोई न कोई बाधा अवश्य आ जाती है। फिर मैं ठहरा एक व्यापारी का बेटा । मेरे भाग्य में तो पैतृकं व्यवसाय ही लिखा है। परिवार के हर सदस्य ने बार-बार यही मंत्र फूका है। मैं भी यही सोचता हूँ कि यदि उन सब की बात को ठुकरा कर यदि मैं पुलिस अधिकारी बन भी गया, तो समाज की सेवा में मेरा क्या योगदान रहेगा।
वर्तमान समाज की दृष्टि में : आज के समाज में पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। इन लोगों को समाज के रक्षक के स्थान पर भक्षक माना जाता है। प्रायः देखा गया है कि भ्रष्ट पुलिस अधिकारी अपनी जेबें गरम करके असामाजिक तत्वों को बढ़ावा देते पाए गए हैं। चोरी करना और डकैती डलवाना ही मानो इनका काम रह गया है। निर्दोष इनकी हवालात की सैर करते हैं और गुण्डे बेधड़क घूमते हैं। पैसे के आगे माँ बेटी की इज्जत भी तुच्छ समझी जाती है। इसीलिए अधिकांश लोग इन्हें वर्दीधारी गुंडों की संज्ञा देते हैं।
यदि पुलिस अधिकारी बनता : यदि मेरी इच्छा पूर्ण हो जाती। और मुझे पुलिस अधिकारी की वर्दी मिल जाती, तो मैं समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाता। मैं अपने क्षेत्र से गुण्डों का सफाया कर देता। इस अभियान में मैं अपनी जान की भी प्रवाह नहीं करता। असामाजिक तत्त्व मुझसे सदा ही भयभीत रहते। मैं अपराधियों को कभी भी माफ नहीं करता और उनके कुकृत्यों का दंड दिलवा कर ही पीछा छोड़ता।
यदि मैं पुलिस अधिकारी बनता, तो कदापि घूस नहीं लेता। जबकि आजकल पुलिस स्टेशन में बापू के चित्र के नीचे ही उनके आदर्शों को भुलाकर जेबें गरम की जाती हैं। निर्धन और दु:खी लोगों को बेवकूफ समझा जाता है तथा पलिस अधिकारी उनकी बात नहीं। सुनते। मैं सबसे पहले असहाय और निर्धन लोगों की शिकायतें सुनता तथा उन्हें दूर करने का भरसक प्रयास करता।
पुलिस का आतंक : उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों में पुलिस का आतंक दिन-दिन बढ़ता जा रहा है। मेरठ का माया त्यागी कापट पलिस की पाशविकता की अमिट गाथा बन गया है। बिहार की ग्रामीण महिलाओं का सामूहिक रूप से शील भंग करना पुलिस का जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है। हाल ही में बनारस में निर्दोषों की तोड़ी गईं अस्थियाँ और उनके हथकरघे पुलिस की पाशविकता की कहानी कह रहे हैं। इतना ही नहीं, इनकी माँग की पूर्ति न करने पर निर्दोषों को पीट-पीट कर यमलोक पहुँचा दिया जाता है। घरों को लुटवाकर आग लगवा दी जाती है।
उपसंहार : आज के युग में जनता भी उन्हें पसंद नहीं करती। उनकी गिद्ध दृष्टि के आगे अपने को असहाय समझती है; लेकिन मैं । पुलिस अधिकारी बनकर ऐसा नहीं होने देता। मैं महिला समाज को पूरा सम्मान दिलाता। अभद्र व्यवहार करने वालों को दण्डित करता। बनावटी मुठभेड़ों में निर्दोषों की हत्या नहीं करने देता। अपराधियों के लिए साक्षात् यमदूत बन जाता। इस तरह मैं स्वयं अन्य पुलिस अधिकारियों के लिए आदर्श बन जाता।

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