यदि मैं शिक्षक होता

हाँ, आपने सच ही सुना है यदि मैं शिक्षक होता, तो आपको पता है मैं क्या करता …
मेरा तो सपना ही था कि मैं शिक्षक बनूं। क्यों कि देशभक्ति तो मेरे अंदर कूट-कूट कर भरी हुई है। मैं जड़ से ही अपने देश को मजबूत बनाना चाहता हूँ। अपने राष्ट्र के भावी कर्णधारों तथा मनु की संतानों को शिक्षा के माध्यम से मानवता का पाठ पढ़ाना और अपने विद्यार्थियों को वास्तविक मनुष्य बनाना ही मेरे जीवन का लक्ष्य होता।मैं गुरु-शिष्य के संबंधों का निर्वाह भली-भाँति करूगा। मैं महात्मा बुद्ध को अपना आदर्श बनाते हुए उनकी ये बातें सदैव याद रखूगा कि गुरु को आकाशम होना चाहिए, शिलाधर्मी नहीं।।
मैं आचार्य चाणक्य को अपना आदर्श मानकर अपने शिष्यों को ठीक चंद्रगुप्त की तरह रंक से राजा बनाने का सफल प्रयास करूंगा।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि जो गुण एक आदर्श शिक्षक में होने चाहिए, वह सब मुझमें हैं। मैं शिक्षण को एक नौकरी समझकर नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी समझ कर करूंगा।
मैं न तो अपने शिक्षण के समय अत्याधिक सख्ती करूंगा न ही अत्याधिक नरमी, जैसे कि आप सभी जानते हैं मैंने अभी हाल ही में अपनी पढ़ाई की है मैं एक विद्यार्थी मन से ताजा-ताजा परिचित हूँ। मुझे उनके मन में चल रहे शिक्षक के खिलाफ़ गलतफहमी सब पता है, मैं सर्वप्रथम उसे मिटाकर आपस में दोस्तों की तरह रहते हुए, जहाँ नरमी की आवश्यकता है, वहाँ नरमी का प्रयोग करूंगा और जहाँ सख्ती की आवश्यकता है, वहाँ सख्ती का प्रयोग करूंगा।
मैं केवल सिलेबस को खत्म करने के लिए नहीं पढ़ाते हुए अपने छात्रों को समाज के प्रति उदार, दयावान, सबकी मदद करने जैसे नैतिक पाठों को प्रमुखता के साथ पढ़ाऊंगा। मैं केवल थ्योरी ही में नहीं बल्कि प्रैक्टिकल में विश्वास रखते हुए उन्हें सभी
जैसा कि मैं पहले कह चूका हूँ कि मैं अपने छात्रों के साथ केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं बल्कि एक मित्र के रूप में व्यवहार करूंगा, साथ ही उनके जीवन के हर क्षेत्र में उनकी मदद करने सदैव तैयार रहँगा, जितना मुझसे संभव होगा मैं उनके लिए जीवन के हर क्षेत्र के दरवाजे खुले कर दूगां, जितना मुझे पता होगा मैं उतना उनमें बाहूँगा, मैं सदैव नई-नई जानकारियाँ हासिल करता रहूँगा, ताकि मेरे छात्रों को मैं सभी जानकारियों से आवगत करा सकें।
मैं किसी भी छात्र के बीच भेद-भाव की भावना को नहीं आने दूंगा। क्योंकि सभी छात्र मेरे लिए एक समान थे, एक समान हैं और एक समान रहेंगे। मैं धन, जाति, संप्रदाय आदि को बीच में नहीं आने दूंगा, साथ ही उन को भी आपस में एकता का पाठ पढ़ाते हुए मिल-जुलकर रहने की सलाह दूंगा।
मैं सदैव उनसे मीठा बोलूंगा और साथ ही उन्हें भी मीठा बोलने के लिए प्रोत्साहित करूंगा।
मैं समय-समय पर अपने विद्यार्थियों को अन्य विद्यालय ले जाकर सेमिनार आदिका आयोजन करवाता रहूँगा ताकि आपस में उनके विचारों का आदने-प्रदान हो और वह बाहरी जीवन से भी आवगत हो सकें।
अंतमें मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा कि यदि जीवन में मुझे कभी भी शिक्षक बनने का मौका मिला तो मैं समाज में अपने लिए एक आदर्श शिक्षक के रूप में पहचान अवश्य बनाऊंगा। साथ ही देश को एक अच्छे नागरिक और भावी कर्णधार श्रद्धा स्वरूप भेंट करूंगा।
क्या आप जानते हैं? हिन्दी की 47 बोलियों के नाम –
1981 की जनगणना में भारत में विभिन्न बोलियों का हिन्दी भाषा के । ! साथ परिगणन – अवधी, बधेली, छत्तीसगढ़ी, बागड़ी-राजस्थानी, बनजारी, भद्रभाषा, भरमौरी / गदी, भोजपुरी, बज्रभाषा, बुंदेली/बुंदेलखंडी, चूराठी, चंबियाली, ढूंढाड़ी, गढ़वाली, गोजरी, हाडौती, हरियाणवी, जौनसारी, कांगडी, खडी बोली, खोट्टा, कुल्ची, कुमाउनी, कुरमलीथार, लबानी, लमानी/लंबादी,  लडिया, लोधी, मागधी । मगही, मैथिली, मालवी, मंडिआली, मारवाड़ी,  मेवाती,नागपुरिया, निमाड़ी, पडारी, पहाडी, पंचपरगनि, पंगवाली, पवारी / पोवारी, राजस्थानी, सदन/ सदरी, मोड़वारी, सुगली, सुरगुजिया, सूरजपुरी।

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