भारतीय संस्कृति

विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों की अगर हम बात करें तो भारत का पहला स्थान आता है। भारत संसार का एक प्राचीनतम विशाल देश है। इस भाँति इसको संस्कृति भी उदार, प्राचीन और गौरवशालिनी है। संस्कृति का संबंध मानवों की आत्मा और मन से होता है किन्तु सभ्यता का संबंध उसकी बाहरी वेश-भूषा, खानपान और उठने-बैठने से होता है।
भारत संसार का महान् देश है। यहाँ की सिर्फ संस्कृति ही विश्व पर अपनी छाप नहीं छोड़ती बल्कि यहाँ के ऋषि-मुनि जो वनों, नदी-तटों और रमणीय पर्वतों की कन्दराओं में बैठे ज्ञान की खोज करते रहते हैं उन्हीं की इस खोज ने भारतीय संस्कृति का मार्ग प्रकाशित किया है। आज भी भारतीय संस्कृति का मूल आदर्श आत्मा का ज्ञान ही है। इसमें संसार के भौतिक तत्त्वों के प्रति कोई मोह नहीं है।पहले संत-महापुरुषों के सत्संग केवल भारत में ही हुआ करते थे पर भारतीय संस्कृति का चस्का विदेशियों को ऐसा लगा कि वह विशेष तौर से हमारे संतोंमहात्माओं को अपने देश में बुलवा कर सत्संग करवाने लगे हैं।
समय-समय पर देश में होने वाले धार्मिक आंदोलनों ने ही संस्कृति को और उदार बनाया है। बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त तथा वैष्णव मत-प्रचारकों ने ही भारतीय संस्कृति में अनेक तत्त्व जोड़े हैं जिनमें मुख्यतः सहनशीलता, अहिंसा, परोपकार आदि गुणों का नाम भी उल्लेखनीय है।
भारतीय संस्कृति की विशेषता जो हमें कहीं और किसी देश में देखने को नहीं मिलती है कि यहाँ भारत देश में सब धर्मों एवं सम्प्रदायों की शिक्षा को एक साथ लेकर चलना और सामूहिक रूप से देश को एक मानना। तभी तो भारत में ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में रामायण, पुराण आदि ग्रंथ पूजे जाते हैं।
संस्कृति के तत्त्व के संबंध में अगर कहा जाए तो हम पाएंगे कि भारतीय संस्कृति चार तत्त्व में विद्यमान है, वह है- चरित्र, विज्ञान, साहित्य और धर्म।
भारतीय संस्कृति में प्रेय और श्रेय के दोनों रूप स्वीकृत हैं। प्रेय से तात्पर्य है लोक में कर्म करते हुए अभ्युदय को प्राप्त करना और श्रेय से तात्पर्य है आत्मिक उन्नति को प्राप्त करना।
भारतीय संस्कृति, साहित्य के माध्यम से विदेशों में भी प्रचारित हो चुकी है। यही कारण है कि आज विदेशी विश्वविद्यालयों में भी भारतीय दर्शन पर पठन-पाठन हो रहा है।
भारतीय संस्कृति की कई विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता तो यही है कि यहाँ सभी समान भाव से आचरण करते हैं साथ ही सभी की विचारधाराओं का सम्मान किया जाता है। दूसरी विशेषता उदारता से संबंधित है। भारतीय जीवन की शक्ति ही उदारता है। सबके प्रति खुले मन से व्यवहार करना यहाँ के जनजीवन का मूलभूत गुण है। साहिष्णुता के गुण से भारतीय संस्कृति का महत्त्व लोक-प्रसिद्धि पा चुका है। तीसरी विशेषता है यहाँ कि शान्ति की जो आज विश्व में कहीं पर भी नहीं है, यही कारण है कि उसी शान्ति की खोज में कई विदेशी लोग भारत आते हैं।
आज विश्व के सभी देश दूसरे देशों में सांस्कृतिक संगठनों की स्थापना करने में लगे हैं। हमारी भारत सरकार ने भी कदम बढ़ाते हुए विदेशों में अपने सांस्कृतिक प्रतिनिधि नियुक्त किए हैं, जो समय-समय पर विदेशों में भारतीय संस्कृति पर व्याख्या करते हैं। इस पद्धति से अन्य देशों के साथ हमारे सांस्कृतिक संबंध मधुर होते जा रहे हैं।
एक बात तो हम दावे से कह सकते हैं कि संसार का कोई भी देश संस्कृति के | बिना जीवित रह ही नहीं सकता, अगर हम संस्कृति को देश की आत्मा कहें तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s