गांधी दर्शन जितना पवित्र और आदर्शात्मक था उतना ही तत्कालीन भारत के लिए उपयोगी भी था। लेकिन 21वीं सदी में यह दर्शन हमारी जीवन शैली से दूर होता जा रहा है और ऐसा मालूम होने लगा है कि गांधी जी के सपनों का भारत कहीं खो गया है। सत्य के नाम पर झूठ एवं धोखाधड़ी, अहिंसा के नाम पर हिंसा और सादगी और सत्याग्रह के नाम पर स्वार्थ, दिखावा और पूर्वाग्रह से ग्रसित परिस्थितियां देखने को मिलती हैं। घोटालों का देश हो जाए यह भारत, इससे बड़ा जुल्म और हो ही क्या सकता है गांधी जी के पदचिन्हों पर चलकर जहां हम गरीबी हटाकर ग्राम विकास का दम्भ भरते थे वहीं आज गरीबी कर चिंता छोड़कर शहरी विकास पर ध्यान दिया जा रहा है। गरीबी के स्थान पर गरीबों को ही हटाया जा रहा है। आधी जनसंख्या का गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करना, भाई-भतीजावाद, रिश्वतखोरी और नौकरशाही हमारे अंग-भंग में शामिल है। धर्म के परदे के पीछे साम्प्रदायिकता का जहर फैलने लगा है, धार्मिक उन्माद से हिंसा का ताण्डव हो रहा है। हमारी स्वतंत्रता एवं स्वाालम्बन को विदेशियों के हाथों बेचा जा रहा है। बढ़ता आंतकवाद, हमारी शांति, एकता और अखण्डता को निगल रहा है।
अब गांधी जी का अस्तित्व तस्वीरों, प्रतिमाआंे व भजन तक सिमट कर रह गया है। प्रति वर्ष गांधी जयन्ती पर फूल-माला चढ़ाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेना ही हमारी और हमारे राजनेताओं की प्रवृति बन गई है। हमें यह सोचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि वास्तव मंे वर्तमान परिस्थितियों में गांधी जी कोई प्रासंगिकता है भी या नहीं।
गांधी जी का सपना कुछ और था। वे पाश्चात्य सभ्यता की चकाचैंध से दूर रहकर भारतीय संस्कृति का उत्थान चाहते थे। उनके सपनों का भारत मानव कल्याण से आपूरित भारत था। उनका मानना था कि जब भी तुम्हें सन्देह हो या तुम्हारा अहंकार तुम्हें परेशान करने लगे, तब तुम स्वंय को निम्नलिखित कसौटी पर परखो-उस गरीब से गरीब और कमजोर से कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करो, फिर खुदा से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो क्या उससे उस व्यक्ति का भला होगा? गांधी जी का तो आदर्श था-
’’सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्विद दुखभाग भवेत।।’’
गांधी जी स्वावलम्बन, समाजवाद, समानता, सादगी और स्वदेशी के माध्यम से ग्राम राज्य और राम राज्य लाना चाहते थे। दुर्भाग्यवश बापू का सपना साकार नहीं हो सका। गांधी के सारे सिद्धान्त हमारे व्यवहार से हटकर सिर्फ ढोल पीटने भर के लिए रह गए हैं। सम्प्रति विज्ञान और टेक्नोलाॅजी प्रधान युग में गांध जी के आदर्शों, सिद्धांतों तथा चिन्तन के साथ-साथ उनकी प्रतिपादित समूची जीवन पद्धति ही प्रासंगिकता के प्रश्नों के घेरे में फंस गई है। उनका विचार इस 21वीं सदी मंे दकियानूसी माना जा रहा है। अहिंसा रूपी ढाल टूट चुकी है, निहत्थी निरीह जनता गोलियों का शिकार हो रही है और गांधी का जीवन दर्शन सत्य की वह ढाल बन चुका है जिसे लेका सर्वत्र असत्य की लड़ाई लड़ी जा रही है। गांधी जी हरिजन उद्धार की बात करते थे, आज उन्हीं के देश में हरिजन इस समाज में सबसे अधिक उत्पीड़ित हैं। उन्हें आरक्षण के छलावे से फुसलाया जा रहा है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के शब्दों में ’गांधी नहीं रहे पर गांधीवाद घसीटा जा रहा हे। सैकड़ों संस्थाएं उनके नाम पर चल रही हैं। सत्ता की नई पौध उनके नाम पर पनपती है। दार्शनिक उनके सिद्धांतों एवं आदर्शों की चकाचैंध फैलाते हैं। संसार को चकित करते हैं।’ गांधीजी का मूलमंत्र था साधन को पाने के लिए साधन की पवित्रता की अनिवार्यता। भारतीय समाज में गांधीजी की सबसे बड़ी देन यही थी कि उन्होंने करोड़ों बेबस लोगों को आत्मनिर्भरता, आत्मशक्ति संकल्प, स्वावलम्बन की प्रेरणा दी। सुस्पष्ट है कि गांधी की राजनीति नैतिक मूल्यों पर आधारित थी। बायड आर. के. का तो यहां तक कहना है कि ’’मेरे विचार स ेअब वह समय आया पहुंचा है जब गांधी जी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को विश्वव्यापी स्तर पर व्यवहार में लाना चाहिए। इसका प्रयोग अवश्य करना चाहिए, क्योंकि जनता वह अनुभव करती है कि इसके सिवा विनाश से परित्राण की कोई आशा नहीं है।’’
’’आजादी के बाद गांधी जैसे सन्त राजनीतिक नेता की सार्थकता ही नहीं रही।’’ यह कथन माक्र्सवादी विचाराधारा के पुरोधा ई. एम.एस. नंबूदरीपाद का है। उनका यह कथन कड़वा तो लगता है लेकिन यह सत्य है। गांधी ने अपने विषय मंे स्वयं भी कहा है-’आज हिन्दुस्तान में कौन-सी ऐसी चीज हो रही है जिसमें मुझे खुशी हो सके। कांग्रेस बहुत बड़ी संस्था हो चुकी है। इसके सामने मैं उपवास नहीं कर सकता। लेकिन आज मैं भटठी में पड़ा हूं और मेरे दिल में अंगार जल रहे हैं।’
गांधी जी ने अपनी नयी जिन्दगी को सार्वजनिक आयाम देकर, अपने दर्शन को जमीन पर उतारकर, आखिरी आदमी की लड़ाई लड़ने की कोशिश की। धनी से लेकर सर्वहारा, कृषक से लेकर जमींदार, बाबू से लेकर अधिकारी, सभी के नेतृत्व का भार उठाया और राजनीतिक जगत में उनका मुकाबला करने वाला अब तक कोई पैदा नहीं हुआ। गांधी जी अपनी मृत्यु के कई दशक बाद भी लोगों के दिमाग मंे लिखित हैं क्योंकि वे भारत के लिए उसी प्रकार थे जिस प्रकार-’गंगा और हिमालय।’
निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि वर्तमान परिवर्तित परिस्थितियो में गांधी दर्शन को अपनाकर चलना जहां मुश्किल है, वहीं उसे पूर्ण रूप से नकारना भी हमारे हित में नहीं है। नए विचारों के बारे में गांधी जी ने कहा था-’’मैं नए विचारों को कदापि नहीं रोकना चाहता, पर मैं उनका गुलाम भी नहीं बनना चाहता।’’ यदि हम कहें वह पुराने युग में थे-उनके सिद्धांत, उनके आदर्श, उनका दर्शन पराधीन भारत के लिए ही मान्य था तो क्या हमारा यह कर्तव्य नही होगा कि हम विचार करें कि आज कौन से सिद्धांत हमारे देश के लिए मान्य होंगे। शांति, सुरक्षा, स्वावलम्बन, सादगी, स्वाभिमान, अहिंसा की आवश्यकता जितनी आज है उतनी तब नहीं थी। बढ़ते हुए कटटरवाद, अलगावाद, आंतकवाद एवं असहिष्णुता के वर्तमान युग में गांधी चिंतन आज पूर्व की अपेक्षा अधिक प्रासंगिक है।
राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती बेरोजगारी, जाति एवं नस्ल की वैमनस्यता, आर्थिक विषमताओं से उभरती, आर्थिक नूतन प्रवृतियों एवं अस्थिरता मे गांधी की राजनीति, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विचारधारा आज अत्यन्त प्रासंगिक है क्योंकि यह इन समस्याओं को सुलझाने में सक्षम है। हमें गांधी दर्शन के समानुकूल दर्शन करने का सदुपयोग करने का संकल्प लेना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही गांधी दर्शन का उपयोग किया जाना चाहिए। आज हमें अंधानुकरण के संकीर्ण मार्ग से थोड़ा हटकर इस दिशा मंे गहन विचार करने की आवश्यकता है ताकि हम उस महान पुरूष के सपने को साकार कर सकें। । हिन्दू-मुस्लिम एकता केवल कहने की बात रह गई है। पश्चिमी शिक्षा और सभ्यता का गहरा रंग चढ़ता जा रहा है, मद्यपान हमारी सभ्यता और सम्मान का परिचायक बन चुका है। जो लोग भ्रष्ट आचरण और चरित्रहीनता के लिए बदनाम हैं, वे ही हर क्षेत्र में हमारे पथ प्रदर्शक एवं भाग्य विधाता बन बैठे हैं-