क्या संसदीय लोकतंत्र असफल हो गया है ?

        भारत द्वारा स्वतंत्रता के बाद संसदात्मक लोकतंत्र अपनाए जाने के बाद कई पश्चिमी विद्वानों का कहना था कि धार्मिक महानता, सामाजिक भेदभाव तथा मूलतः असंगठन में लिप्त भारत संसदीय लोकतंत्र के उपयुक्त नहीं है, परन्तु उनके ये आक्षेप चूर-चर हो गए, जब विभाजन के बाद राष्ट्रीय सरकार ने 552 रियासतों को भारत में मिला लिया। इसलिए मौरिस जोन्स का कहना था कि भारत में संसदीय राजनीति का प्रतिरूप उदय हो चुका है। उसने उस समय का सब भ्रान्तियों को दूर कर दिया हो भारत में संसदीय लोकतंत्र की सफलता के बारे में उत्पन्न की गई थी।

                वर्तमान में समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि भारत में संसदीय लोकतंत्र असफल हो गया है और इसकी जगह राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू की जाए। राष्ट्रपति शासन वह शासन है जिसमें कार्यपालिका अपनी अवधि, शक्तियों और कार्यांे के सम्बन्ध में व्यवस्थापिका से स्वतंत्र रहती है। इस व्यवस्था में राष्ट्रपति राज्य एवं सरकार दोनों का प्रधान होता है। संसदीय लोकतंत्र सुचारू रूप से चल सके, क्या वह भारत में विद्यमान है। इन शर्तों में अनुशासन, चरित्र, संयम, नैतिकता की उच्च भावना, अल्पसंख्यक दृष्टिकोण को सुनने की तत्परता, राजनीतिक सहिष्णुता तथा सहनशाीलता की आवश्यकता होती है।

                जहां तक पहली शर्त अनुशासन की बात है, हमारे प्रतिनिधियों का  अमर्यादित आचरण जगजाहिर है। संसद भवन में ये लोग एक-दूसरे की आलोचना करते हैं, गाली-गलौज करते हैं; असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं। राज्यों की विधानसभाओं में तो स्थिति कई बाद भारी अराजकता की सी बन जाती है। चरित्रवान व्यक्ति का आज संसद में पहुंचना बहुत कठिन कार्य है क्योंकि राजनीति का अपराधीकरण एवं अपराध का राजनीतिकरण हो गया है। चुनाव के दौरान बूथ कैप्चरिंग, धन के बला पर वोटों को खरीदना तो आम बात है।

                संसदीय लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों की जनता के प्रति जवाबदेही होती है। इस जवाबदेही की उपेक्षा के चलते हमारे संसदीय लोकतंत्र का क्षरण हुआ है। संसद के लिफ्ट संख्या-2 के निकटवर्ती गुम्बज का भिŸिा लेख दो शाश्वत गुणों- सत्य और धर्म-पर जोर देते हैं, सिसका संसद को पालन करना चाहिए। अंकित सूक्ति कहती है-“सभा वा न प्रवेष्टव्या, वक्तवयं वा सामंजसम अबुवन विबुवन वापि, नरो भवति किल्विषी।“ जिसका हिन्दी अर्थ है-कोई व्यक्ति या तो सभा में प्रवेश ही न करे अथवा यदि व ऐसा करे तो वहां धर्मासुनार बोलना चाहिए क्योंकि न बोलने वाला असत्य बोलने वाला मनुष्य दोनों ही पाप के भागी होते हैं। इस सूक्ति की रोशनी में जब हम अपने सांसदों के आचरण का अध्ययन करें तो पाएंगे कि हमारे जनप्रतिनिधि अपने मतदाताओं और अन्तर्वस्तु में संसदीय लोकतंत्र को समृद्ध करने के लिए क्या करते हैं। इनके आचरण व राजनीति से ही आम जन को घृणा पैदा होने लगी है, जिसके लिए इसका स्वयं का गैर जिम्मेदाराना जनविरोधी आचरण मुख्य रूप से जिम्मेदार है।

                दल-बदल संसदीय लोकतंत्र का शोक कर्म है। दल-बदल विरोधी कानून बनाए जाने के बावजूद हमारी संसदीय व्यवस्था को घुन की तरह खा रहे इस गम्भीर रोग को रोकने के लिए हमारी संसद ने कठोर कदम नहीं उठाया क्या ऐसा कठारे कानून नहीं बनाना चाहिए जिससे दल-बदल करने वाले संासद एवं विधायक को तत्काल प्रभाव से अपनी सीट से त्यागपत्र देना पड़े इसके साथ ही गैर जिम्मेदारी एवं निजी लोभा से प्रेरित प्रतिनिधियों को जनता द्वारा वापस बुलाने (राइट टू रीकाॅल) का अधिकार दे देला चाहिए।

                अनेक लोग तर्क दे रहे हैं कि बहुदलीय प्रणाली संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए उŸारदायी है। लेकिन यदि ब्रिटिश संसदीय लोकतंत्र का उदाहरण लिया जाए तो वहां भी शुरू में बहुदलीय प्रणाली थी, लेकिन वहां की जागरूक जनता ने अन्य दलों का नकार दिया तथा यह परम्परा बना दी कि दो ही दल उचित है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि बहुदलीय प्रणाली की कमियों को दूर करने के लिए जनता को शिक्षित किया जाए एवं उन्हें जागरूक बनाया जाए, जिससे भारत में संसदीय लोकतंत्र समृद्ध हो सके। आज लोकतन्त्रीय संस्थाओं में बढ़ती अनास्था का ही परिणाम है कि केन्द्रीयकरण की घातक प्रवृŸिा बढ़ रही है और राष्ट्रपति शासन प्रणाली है कि केन्द्रीयकरण की घातक प्रवृŸिा बढ़ रही है और राष्ट्रपति शासन प्रणाली की मांग एक तरफ से तो जायज दिखाई देती है। राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपना जी जाए, जिसमें राष्ट्रपति के हाथों में सम्पूर्ण शासन होता है तो इससे लोकतंत्र का मूल उ६ेश्य ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि संसदीय लोकतन्त्र में प्रशासन का कार्यभार जनता द्वारा  चुले गए प्रतिनिधियों को रहता है। जबकि राष्ट्रपति प्रणाल में राष्ट्रपति प्रशासनिक पदों पर अपने मनुकूल व्यक्तियों की नियुक्ति करता है। इसलिए इस प्रणाली में जनता की अनदेखी हो सकती है और भारत जैसे विकासशील देश के लिए तो यह और खतरलाक हो सकता है। इसके अतिरिक्त हमारे यहां सैनिकों को प्रशासन से अलग रखा गया है। इसलिए यदि एकाएक राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपना जी जाती है तो इन सैनिकों के माध्यम से राष्ट्रपति तानाशाह बन सकता है और भाता की लोकतांत्रिक एवं सांविधानिक भावनओं को ठेस पहुंच सकती है।

                आवश्यकता है भारतीय संसदीय लोकतंत्र की जो कमजोरियां हैं, उन्हें दूर किया जाए क्योंकि संसदीय लोकतांत्रिक परिवेश में ही समस्याओं का समाधान हो सकता है। इसके लिए आवश्यकता है कि सम्पूर्ण समाज के जनवादीकरण के लिए चैतरफा प्रयास चलाया जाए। जनवाद की विरोधी सामंती शक्तियों को श्किस्त दी जाए। राज्य मशीनरी का जनवादीकरण किया जाए, जिससे आम जनता की भागीदारी बढ़ेगी। केवल संसदीय लोकतंत्र में ही जन शिक्षण हो सकता है, क्योंकि इस व्यवस्था में सरकार जनता की आवश्कताओं के प्रति अनुक्रियाशील रहती है। साथ जी यह कहा जा सकता है कि केवल इसी व्यवस्था में लोकतांत्रिक सिद्धांतों का रक्षण हो सकता है।

                निष्कर्षतः, यह कहा जस सकता है कि राष्ट्रपति शासन की मांग विचार के स्तर पर तो ठीक है, लेकिन यह कहना कि अपने देश की समस्याएं इसी तरह ठीक हो सकती हैं-इस कहावत को चरितार्थ करता है कि ’नाच न जाने आंगन टेढ़ा’। इसीलिए हमारी संसद का लोकतंत्र को जमीना स्तर पर मजबूत करने के कार्य में लगना चाहिए, तभी संसदीय लोकतंत्र का वृक्ष फलदायी वृक्ष के रूप में विकसित हो सकता है अन्यथा समस्याएं बढ़ती जाएंगी।

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