औधोगिकरण

   जिसे अंग्रेजी भाषा में इंडस्ट्रियलाइजेशन कहा  जाता है, उसे ही हिन्दी में उद्योगीकरण कहा जाता है। इसका आशय यह है कि किसी भी देश में वहां के आर्थिक विकास के लिए वैज्ञानिक आधारों पर और विशाल पैमाने पर उद्योग का विकास हो। कारण, आज केवल ग्रामीण अद्योग-धन्धे ही इसके लिए पर्याप्त नहीं कहे जा सकते हैं। कारखानों से उत्पादन भी हो और उत्पादित वस्तुओं को खपाने के लिए बाजार भी हो। तब लाभ यह होगा कि वस्तुओं की मांग बढ़ने से अधिकाधिक उत्पादन हो सकेगा। तब परिणाम यह होगा कि बेकारी की समस्या बहुत हद तक दूर हो सकेगी। पूंजी किसी व्यक्ति विशेष के हाथ में नहीं रहकर कुछ तो कारखानों में व्यय होगी और कुछ पर सरकार का नियंत्रण रहेगा। इससे मजदूरों के शोषण की बात समाप्त होगी। सब लोग अधिक परिश्रम करेंगे और देश उन्नति की ओर अग्रसर होगा। आज भारत में उपर्युक्त कारणों से उद्योगीकरण की अपेक्षा है।

                अंग्रेजों के भारत आगमन से पूर्व यहां कच्चे माल का उत्पादन बहुत होता था और फिर दैनिक उपयोग के लिए वस्तुएं भी तैयार होती थीं। लेकिन वैज्ञानिक साधनों को यहां अभाव था और पश्चिमी राष्ट्र इन साधनों को अपनाकर धनी होते जा रहे थे। जब अंग्रेज भारत में आए तब उनका उद्योग केवल इंग्लैण्ड द्वारा निर्मित माल को यहां खपाना था। ग्रामीण उद्योगों की अपेक्षा यह सस्ता भी था और चमकदार भी। अतः अधिकांश व्यक्तियों का ध्यान उधर आकृष्ट होना स्वाभाविक था। लेकिन भारतीय माल पर टैक्स बढ़ा दिया गया, फलतः उनका निर्यात भी रूक गया और अपने देश में भी महंगा होने के कारण कम प्रयुक्त होने लगा। अंग्रेजी शिक्षा तथा रहन-सहन का प्रसार होने के कारण भारतीय भारतीयता को भूलने लगे। भारतीय आत्मा पर विदेशी आवरण चढ़ने लगा। इंग्लैण्ड निर्मित वस्तुएं भारत में खूब बिकने लगीं। लेकिन अंग्रेजों ने हमारे यहां (भारत में) अपने वैज्ञानिक साधनों का प्रयोग नहीं किया। भारत में ग्रामीण उद्योग धीरे-धीरे समाप्त हाने लगे तथा भारत अंग्रेजी माल की  मण्डी बन गया। हमें अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रतिपल विदेशी माल की शरण लेनी पड़ी। लेकिन हर्ष का विषय यही है कि आज हम स्वतंत्र है और भारत सरकार उद्योगीकरण के लिए सतत प्रयत्नशील है।

                आज औद्योगिक विकास के लिए अनेक साधन उपलब्ध हैं। हम जिस रूप में चाहें उनका प्रयोग कर लाभान्वित हो सकते हैं। सर्वप्रथम इनके लिए कच्चे माल की अपेक्षा है। लोहे-कोयले के प्रचुर भंडार भारत में हैं। अतः कारखानों के चलाने में कोई परेशानी नहीं हो सकती। इसके बाद वैज्ञानिक साधनों के प्रयोग का प्रश्न उठता है। इस सम्बन्ध में अभी हमें अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन यदि इन मशाीनों को मंगाकर यहां काम में लाया जाए तो उत्पादन बढ़ सकता है। अनेक स्थानों पर इस साधनों का अधिकाधिक प्रयोग किया जा रहा है। साथ ही सीमेंट, लोहा-इस्पात, सूती-उद्योग, मशीनों के छोटे-छोटे पुर्जे, हवाई जहाज, बिजली के अनेक सामान भी इन्हीं आधारों पर बनने लगे हैं। इनके अतिरिक्त इसके लिए कुशल मजदूरों की आवश्यकता है और यह तभी सम्भव है जबकि यहां औद्योगिक-शिक्षा का पर्याप्त प्रचार हो। शैशव से ही बच्चे की रूचि-अनुकूल क्षेत्र में विकास के लिए साधन जुटाए जाएं। वैज्ञानिक-साधनों के साथ उनके प्रयोबों की विधियों से भी अवगत होना जरूरी है। जिससे परिस्थिनिवश मशीनादि में कोई त्रुटि होने पर पुनः विदेश दौड़ना न पड़े अन्यथा देश का धन इन्हीं खात्राओं में समाप्त हो जाएगा। देश ने पूंजीपतियों का भी इस ओर (उद्योगीकरण की दिशा में) प्रेरित किया जाना चाहिए। छोटे व्यापार से अधिक लाभ उठाने की उनकी प्रवृŸिा को कम किया जाए। ऐसे बाजारों की भी व्यवस्था की जाए जहां निर्मित माल को बेचा भी जा सके। हमाराी पंचवर्षीय योजनाओं का इसमें बहुत अधिक हाथ है। इन साधनों की व्यवस्था और प्रयोग से जहां हम दैनिक जीवन की अपेक्षित वस्तुओं का प्राप्त कर सकेंगे वहां सैनिक-दृष्टि से भी उद्योगीकरण में सफल हो सकेंगे, क्योंकि गोली-बारूद एवं आयुध आदि वस्तुओं का निर्माण भी देश-रक्षा के लिए आज के युग में आवश्यक है।

                भारत सरकार का कर्तव्य है  िकवह व्यापारियों का मूलभूत सुविधाएं प्रदान करे। उन्हें उद्योग-विकास की ओर बढ़ने की प्रेरणा दे। शिक्षा का विशेष प्रबन्ध हो और इस प्रकार तैयार माल को देश के कोने-कोने में पहुंचाने का कार्य भी सरकार द्वारा पूरा हो। फलतः हमारा पैसा हमारे ही पास रहेगा तथा हमारी आवश्यकताओं की भी सहज ही पूति हो सकेगी। उद्योगीकरण ही भारत के भावी विकास में सर्वाधिक उपयोगी है।

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